April 26, 2026 10:11 PM

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सेंटिफिक खनन नीति पर सरकार करे विचार

 

बाढ़ की विभीषिका में तबाह हुए हिमाचल में बाढ़ का एक आश्चर्यजनक पहलु उभर कर आया है। जिस पर सरकार व विभाग को काम करने की जरुरत है। नदी-नालों के किनारे बाढ़ से हुई तबाही पर गौर की जाए तो बाढ़ ने सबसे ज्यादा नुकसान उन क्षेत्रों में किया है जिनमें नदी-नालों के पानी को निकलने का रास्ता साफ नहीं था। हालांकि अधिकांश चिंतकों ने खनन को तबाही का जिम्मेदार ठहराते हुए विभाग व सरकार को स्लीव पर टांगा है लेकिन यथार्थ के धरातल पर स्थिति दूसरी है। जिन-जिन नदी-नालों में साइंटिफिक खनन हुआ है उन-उन नदी-नालों के किनारे बाढ़ के नुकसान की स्थिति करीब-करीब शुन्य है। इस स्थिति को देखते हुए यह कहा जा सकता है कि अगर हिमाचल प्रदेश के नदी-नालों व खड्डों में खनन की स्थिति को स्टडी करके साइंटिफिक खनन हो तो नुकसान को पूरी तरह बचाया जा सकता है। ब्यास नदी की तबाही पर गौर करें तो कुल्लू-मनाली में ब्यास ने उनके किनारों को सबसे ज्यादा लीला है जहां रिवर बेड के बीच बह कर आए बड़े-बड़े बोल्डरों ने एक टापु की शक्ल ले ली थी। लिहाजा उन टापुओं से रुका बाढ़ का भयंकर प्रवाह लगातार किनारों को लीलता गया जिससे अधिकांश सड़कें तबाह हुई। कीरतपुर-मनाली एनएच का अधिकांश भाग इसी बाढ़ की भेंट चढ़ा। क्योंकि पानी का फ्लो नदी की साइडों के कटाव का मुख्य कारण बना। जानकार बताते हैं कि खनन विभाग ने ब्यास नदी के रिवर बेड में 40 से ज्यादा साइटें खनन के लिए उपयुक्त पाते हुए ऑक्शन की थी लेकिन फॉरेस्ट कन्जर्वेशन एक्ट के चलते एफसीए की क्लीयरेंस नहीं मिली और इन साईटों पर डिपॉजिट करोड़ों क्यूबिक मीटर मिनरल इस तबाही का सबसे बड़ा कारण बना है। जिसके कारण ब्यास नदी के चैनलाइजेशन पर बाढ़ का भारी असर हुआ और जिसके कारण किनारे पूरी तरह तबाह हो गए। जानकारी यह भी है कि ब्यास नदी से मात्र .5 फीसदी मिनरल ही उठ सका है। क्योंकि फोरेस्ट कन्जर्वेशन एक्ट ब्यास नदी से मिनरल उठाने में सबसे बड़ा अडंग़ा बना है। जिस कारण से बाढ़ यहां हर साल तबाही मचा रही है। सवाल यह उठता है कि फॉरेस्ट कन्जर्वेशन एक्ट हो या कोई दूसरा कानून। अगर यह कानून तबाही का कारण बन रहे हैं तो इनको एकदम बदलने की सख्त जरुरत है। बाढ़ के कुदरती रुख को समझें तो यह प्रदेश की आर्थिकी का मजबूत आधार बन सकता है। बशर्ते खनन को लेकर स्टडी के आधार साइंटिफिक खनन शुरू किया जाए। मुख्यमंत्री के गृह जिला हमीरपुर में जिसमें खड्डों-नालों ने अपेक्षाकृत कम नुकसान किया है। वहां एक ही कारण सामने आया है कि इनमें से काफी खड्डों का साइंटिफिक खनन हुआ था जो कि अब बाढ़ को बचाते हुए करोड़ों क्यूबिक मीटर मिनरल के डिपॉजिट का कारण भी बना है। हमीरपुर की प्लाही खड्ड कुदरत द्वारा डिपॉजिट किए गए मिनरल का बड़ा भण्डार बनी है क्योंकि इस खड्ड में लम्बे अरसे से खनन नहीं हुआ था और अब आलम यह है कि प्लाही खड्ड पर बने पुल और खड्ड के धरातल में 4 मीटर की दूरी बची है। अगर समय रहते यहां से साइंटिफिक खनन द्वारा सफाई नहीं की गई तो निकट भविष्य में इस पुल को भी बाढ़ तबाह कर सकती है, यह निश्चित है। लोक निर्माण विभाग की मानें तो प्लाही खड्ड में पुल के नीचे 4 लाख क्यूबिक मीटर यानी करीब 40 हजार ट्रक मिनरल डिपॉजिट हो चुका है जो कि पुल व सड़क के साथ-साथ आसपास के क्षेत्रों के लिए खतरा बना हुआ है। जिसको लेकर जिला प्रशासन के साथ मामले की गंभीरता का मसला उठाया गया है और जैसे ही अनुमति मिलती है विभाग इस पर युद्ध स्तर पर काम करेगा।
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बाढ़ की विभीषिका का दूसरा पहलु यह है कि पहाड़ों पर बड़े स्तर पर चले विकास कार्यों से जो भी मिट्टी, पत्थर निकल रहे हैं वो सीधे नदियों से होते हुए प्रदेश के बड़े बांधों के लिए खतरा बने हैं, जिसमें पौंग डैम, भाखड़ा, पंडोह डैम व नया बना कोल डैम लगातार सिल्ट व पत्थरों से भर रहा है जिस पर अगर अभी से गौर नहीं हुआ तो आने वाले समय में हिमाचल के साथ-साथ अन्य पड़ोसी राज्यों की तबाही का भी कारण बनेगा।

प्रदेश में लगातार चले विकास में साइंटिफिक खनन वरदान साबित हो सकता है। वहीं विकास की जरुरतों के साथ प्रदेश की आर्थिकी का बड़ा आधार साबित हो सकता है।
विजय चौधरी, एसई पीडब्लयूडी विभाग हमीरपुर।

साइंटिफिक खनन न केवल बाढ़ की विभीषिका को कम करेगा बल्कि प्रदेश की आर्थिकी का बड़ा आधार बनकर विकास कार्यों की जरुरत भी पूरी करेगा। खनन पर कुदरत के रुख को देखते हुए स्टडी बेस्ड साइंटिफिक खनन समय की मांग नहीं जरुरत है।
संजीव कुमार, स्टेट जियोलॉजिस्ट शिमला।

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