शिमला की राजनीति में हमीरपुर फिर बना हीरो
आवाज हिमाचल । हमीरपुर
वर्ष 2017 से हिमाचल प्रदेश की राजनीति के घटनाक्रमों को प्रदेश के सबसे छोटे जिला हमीरपुर में केंद्रित रखने के हुनर में मास्टर विधायक राजेंद्र राणा ने एक बार फिर सियासी मास्टर स्ट्रोक खेला है। 2017 में बीजेपी के घोषित मुख्यमंत्री प्रेम कुमार धूमल को सुजानपुर में हराकर आश्चर्यचकित कर देने वाले राणा ने अब हिमाचल प्रदेश में पूर्ण बहुमत वाली कांग्रेस सरकार के बावजूद राज्यसभा सीट में कांग्रेस की हार को सुनिश्चित करके फिर एक बड़ा सियासी करिश्मा किया है। अगर कांग्रेस के 40 विधायक सत्ता में होने के बावजूद कांग्रेस राज्यसभा की सीट हारी है तो इसके कई महत्वपूर्ण कारण हो सकते हैं। लेकिन मंत्री और विधायकों की नाराजगी के बीच अगर कांग्रेस अपने कुनबे को नहीं संभाल सकी है तो यह कांग्रेस कमी और खामी के रूप में ही दर्ज किया जाएगा। असंभव से दिखने वाले सियासी घटनाक्रम को अगर राणा की नाराजगी ने संभव कर दिखाया है तो राजेंद्र राणा के राजनीतिक कौशल का लोहा भी दोनों ही दलों में साबित हुआ है। राज्यसभा चुनाव में कांग्रेस के छह विधायकों के क्रास वोटिंग करने से न केवल सरकार के प्रबंधन का जनाजा निकला है बल्कि इस घटनाक्रम ने विधायक राजेंद्र राणा को सियासी नायक के तौर भी स्थापित कर दिखाया है।
मुख्यमंत्री के जिला हमीरपुर के आजाद विधायक सहित अगर दोनों अन्य विधायक सरकार के विरोध में विद्रोह के लिए उठ खड़े हुए हैं तो कांग्रेस सरकार को अपनी कारगुजारी का अवलोकन करना होगा।
तीसरी बार जीते विधायक इंद्र दत्त लखनपाल जो अपनी राजनीतिक पेंशंस के लिए प्रदेश की राजनीति में चर्चित रहते हुए स्थापित हुए हैं ऐसे में अगर इंद्र दत्त लखनपाल सरकार और उसके करिदों के व्यवहार से अधीर और आहत होकर कुपित हो बैठें हैं तो निश्चित तौर पर सरकार का व्यवहार उनके प्रति उपेक्षित व प्रताडि़त कर देने वाला रहा होगा कि उन्होंने आहत होकर कांग्रेस से पिंड छुड़ाने में अपनी भलाई समझी होगी।प्रदेश की राजनीति में यह किसी से छिपा नहीं है कि चुने हुए विधायकों से सरकार के सिलेक्टड स्वयंभू नेता किस कदर उनके विधानसभा क्षेत्रों में दखलंदाजी करके उनको जलील करते रहे हैं। चर्चाएं तो यहां तक है कि सरकार के सिलेक्टड स्वयंभू नेताओं ने चुने हुए प्रतिनिधियों को कदम-कदम पर जलील करके उनके क्षेत्र में उनको ही खूडेलाइन लगाने की हरसंभव कोशिश व साजिश की है। नतीजतन इन विधायकों व मंत्रियों ने सरकार की मनमानी पर अंकुश लगाने के लिए क्रास वोटिंग का फैसला लिया है। जिसके चलते 40 विधायकों वाली सरकार गहरे राजनीतिक संकट में आ चुकी है। भविष्य में हिमाचल में सियासी घटनाक्रम क्या रुख लेता है यह देखने वाली बात होगी। कांग्रेस सरकार पर अपने ही विधायकों की नाराजगी इस कदर भारी पड़ी है कि अच्छी खासी बहुमत वाली सरकार के होश फाख्ता हो चुके है। कहना न होगा कि पिछली बीजेपी सरकार पर लगातार ताबड़तोड़ हमले करने वाले विधायक राजेंद्र राणा ने हमीरपुर में न केवल कांग्रेस को जिंदा रखा बल्कि 2022 के चुनावों में बीजेपी को शिखर से सिफर कर देने वाला सियासी करिश्मा भी कर दिखाया और अब राज्यसभा चुनाव की एक सीट पर फिर सियासी भूचाल लाकर राजेंद्र राणा ने हमीरपुर की सियासत को चर्चाओं में ला कर रख दिया है। अपने राजनीति कौशल के दम पर राजेंद्र राणा ने दुनिया की सबसे बड़ी पार्टी बीजेपी में खुद की अहमियत व काबालियत को भी साबित कर दिखाया है वहीं दूसरी ओर कांग्रेस में भी अपने सियासी हुनर व रसूख के दम पर खुद को एक बार फिर सशक्त नेता के तौर पर उभारा है।






