कारगिल विजय दिवस पर पूर्व मुख्यमंत्री प्रो. प्रेम कुमार धूमल ने लिखा लेख
लेख में कारगिल युद्ध के दौरान कई अनछुई बातों का किया जिक्र
देश कारगिल शहीदों के बलिदान को ताउम्र रखेगा याद हमीरपुर
आवाज हिमाचल। हमीरपुर
26 जुलाई को पूरा भारत कारगिल विजय दिवस के रूप में मना रहा है। 24 साल पहले हमारे वीर सैनिकों ने कारगिल पर विजय हासिल की थी और इस दौरान देश ने कई वीर जवान भी खोए थे। कारगिल युद्ध के दौरान हिमाचल प्रदेश के 52 जवान भी शहीद हुए थे। कारगिल युद्ध के दौरान कई ऐसी अनछुई बातें हैं जिनका जिक्र शायद ही हुआ हो और कम ही लोग इन बातों को जानते हों। दो हिमाचल प्रदेश का प्रतिनिधित्व कर चुके पूर्व मुख्यमंत्री प्रो. प्रेम कुमार धूमल ने कारगिल विजय दिवस के मौके पर एक लेख जारी करते हुए उन अनछुई बातों का जिक्र किया है। पूर्व मुख्यमंत्री प्रो. प्रेम कुमार धूमल ने अपने लेख में लिखा है कि कारगिल युद्ध के दौरान प्रदेश में बीजेपी की सरकार थी और उसका नेतृत्व मुख्यमंत्री के तौर पर मैं स्वयं कर रहा था। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी उस दौरान हिमाचल के प्रभारी थे।
हमने आपस में विचार-विमर्श करने के बाद सैनिकों के लिए खाद्य सामग्री व दैनिक उपयोग की सामग्री कारगिल तक पहुंचाने का निर्णय किया और 4 जुलाई को हैलिकॉप्टर के माध्यम से इस सामग्री को लेकर श्रीनगर पहुुंचे। 5 जुलाई प्रात: ही हम श्रीनगर से कारगिल के लिए रवाना हुए। जब हमनें कारगिल में लैंड किया तो चारों तरफ गोलाबारी हो रही थी। सेना के एक वरिष्ठ अधिकारी ब्रिगेडियर नंद्राजोग के नेतृत्व में हमें युद्ध से संबंधित हर गतिविधि की जानकारी मिल रही थी। हमनें भूमिगत मोर्चे में मौजूद सैनिकों को सामग्री सौंपी। शाम को श्रीनगर वापिस पहुंच कर सैनिक अस्पताल गए। घायल सैनिकों का कुशलक्षेम पूछा और उन्हें आवश्यकता की सामग्री प्रदान की। लेकिन इस बीच घायल अवस्था में बेड पर लेटे एक जवान ने उस सामग्री को हाथ में लेने से मना करते हुए उसे टेबल की ओर रखने का इशारा किया।
हमनें सोचा कि शायद सैनिक हमसे खफा है लेकिन उसी समय वहां पर डॉक्टर ने बताया कि इस सैनिक के दोनों हाथ और पांव बलास्ट में उड़ गए हैं। हम वापिस गए और उस सैनिक के सिर पर हाथ रख कर पूछा कि बहुत दर्द हो रहा होगा लेकिन उस सैनिक ने जवाब दिया कि साहब पहले दर्द था लेकिन अब नहीं है। हमनें कहा कि डॉक्टरों ने दर्द की दवाई या टीका लगाया होगा। उसने कहा नहीं साहब, कल शाम को मेरे साथियों ने टाइगर हिल को दुश्मनों से वापिस ले लिया है। उसी समय से मेरा दर्द खत्म हो गया है। यह सुनकर हम सब भावुक हो गए और उस सिपाही के देश के प्रति जज्बे को सलाम किया।
इस कारगिल युद्ध में जिला हमीरपुर के 8 शूरवीरों सहित प्रदेश के 52 सैनिकों ने शहादत पाई थी। वापिस लौटने के बाद में हर शहीद सैनिक के घर गया। हर शहीद परिवार की दिल को छू लेने वाली बातें सुनीं। जब पालमपुर कारगिल युद्ध के प्रथम शहीद कैप्टन सौरभ कालिया की माता अपने पास बैठी। शहीद परमवीर चक्र कैप्टन विक्रम बत्रा की माता को ढांढस बंधा रही थी। एक मां जिसने अपना बेटा खोया था वो दूसरी मां जिसने अभी-अभी अपना बेटा खोया है उसे सांत्वना दे रही थी। ऐसे ही बिलासपुर जिला के शहीद संजय कुमार जिसे परमवीर चक्र से नवाजा गया था कि माता ने अपने लाल की अंतिम विदाई में अपने बेटे को डेढ़ किलोमीटर तक कंधा दिया था। पालमपुर के हवलदार रोशन लाल का जवान बेटा इसी युद्ध में देश के लिए शादी के मात्र 15 दिनों बाद ही शहीद हो गया था। शहीद रोशन लाल ने 1965 के युद्ध में जिस मोर्चे पर तैनात हो कर शहादत पाई थी उसी मोर्चे पर बेटे राकेश कुमार ने 1999 में शहादत को चूमा था। इसी तरह हमीरपुर के बमसन के शहीद राजकुमार के पिता हवलदार खजान सिंह ने मेरे कुछ कहने से पहले ही बेटे की शहादत पर कहा कि धूमल साहब बेटे तो पैदा ही इसलिए होते हैं कि वह बड़े होकर देश की रक्षा में अपने जीवन का बलिदान करें। आप दिल्ली जा रहे हैं तो प्रधानमंत्री वाजपेयी जी से कहना कि यदि सैनिकों की कमी हो तो 82 वर्ष का हवलदार खजान सिंह आज भी हथियार उठाकर देश सेवा करने के लिए तैयार है। यह सब देख व सुन सब दंग और सुन्न रह गए और शहीद व उसके परिवार के जज्बे व देश प्रेम के आगे नतमस्तक होने को मजबूर हो गए। उन्होंने अपने लेख में इसी तरह प्रदेश के कारगिल युद्ध में हुए अन्य योद्धाओं का उल्लेख भी किया है।








