आवाज हिमाचल। हमीरपुर
बेहतर स्वास्थ्य सुविधाओं के साथ मेडिकल कॉलेज व अन्य अस्पताल खोलने का श्रेय लेने की सियासी पार्टियां जितने मर्जी निगाड़े पीट लें व जितना मर्जी कागजी श्रेय लूट लें लेकिन यथार्थ के धरातल पर हकीकत यह है कि सरकार चला रहे सियासी नुमाइंदों को ही ऐसे सरकारी इंस्टीच्यूशनों पर भरोसा नहीं है। शायद यही कारण है कि जनता के जनादेश से सरदार बने सियासी नुमाइंदे अपनी छोटी सी छोटी बीमारी के लिए या तो प्राइवेट महंगे अस्पतालों का रुख करते हैं या फिर हर छोटी बीमारी के लिए पीजीआई चण्डीगढ़ पर भरोसा करते हैं। खबरों की खबर यह है कि विगत दिनों सरकार के एक सियासी युवा नुमाइंदे की आंख की छोटी बीमारी के लिए उन्हें चण्डीगढ़ का रुख करना पड़ा। सरकार का सियासी दारोमदार संभालने वाले इस युवा नेता का आंख का पर्दा जरा सा क्या हिला कि सरकार चिंतित हो उठी। सरकार ने इसका इलाज करवाने की खुद टेलीफोनिकली सिफारिश पीजीआई चण्डीगढ़ के अधिकारियों को कर डाली कि इस युवा नेता का बेहतर से बेहतर इलाज किया जाए। इसी कड़ी में सरकार का एक और नुमाइंदा अपने परिजन को इलाज के लिए चण्डीगढ़ पहुंचा हुआ था। जिसने अपने रसूख प्रभाव से अपने परिजन का तत्काल इलाज करवाया। जबकि हमीरपुर का एक और नुमाइंदा भी अपने चेकअप के लिए चण्डीगढ़ पहुंचा हुआ था। इस सूरत को देखकर चण्डीगढ़ पीजीआई की एक अधिकारी ने टिप्पणी कर डाली कि हमीरपुर की सारी सरकार ही बीमार हो गई है क्या? आलम यह है कि जिस आंख की बीमारी के लिए सरकारी साहब चण्डीगढ़ पहुंचे थे उसी आंख की बीमारी के लिए हिमाचल में चल रही मेडिकल कॉलेजों में आधा दर्जन से लेकर दो दर्जन तक की टीमें हर मेडिकल कॉलेज में मौजूद हैं। इसके अतिरिक्त अन्य सरकारी स्वास्थ्य उपक्रमों में सैकड़ों विशेषज्ञ मौजूद हैं। लेकिन वहां कभी दवाईयों तो कभी डॉक्टरों के अभाव में सिर्फ जनता मजबूरी में इलाज करवाती है। क्योंकि हर आदमी चण्डीगढ़ नहीं पहुंच सकता है। लेकिन खबरों की इस खबर से यह स्पष्ट हो जाता है कि सरकारी साहब सरकारी सुविधाओं या सिफारिश के दम पर अपना इलाज या तो निजी महंगे अस्पतालों में करवाने या फिर चण्डीगढ़ में करवाने को प्राथमिकता देते हैं। जो कि यह बात साबित करने के लिए काफी है कि सरकारी साहबों को सरकार द्वारा दी जा रही स्वास्थ्य सुविधाओं पर कोई भरोसा नहीं है।





